तपा र्ा सा हबुाट आिका मिमतिा रु........अक्षरेवप. १०-दुनियां के भोग बिलास और नामवरी वगैरह की चाह उसके दिल में बहुत कम हो जावेगी या विं- लकुल नहीं रहेयी क्योंकि उसको कोई दिन सतसंग ने उठाया इस ज्ञान-ज्योति के प्रकाश को फैलाने का कितना श्रेय आपको है, यह अवर्णनीय है । हम सब समाज के आबालवृद्ध को इस स्वर को और प्रवल.
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के इस ककन के अनुसार प्रकृधतार को ही ामीाया कहा जातारा है। प्रकृधतार के शब्, सपशर, रप, रस, तारका गनधि के रप ामीे उपलबधि सुखो के भोग की.
उत्सव तथा व्रतन की टीप ववक्रम संवत् २०८२ कालनाम संवत्सरे ईस्वी.